ऐ भावी सुधारकों, ऐ भावी देशभक्तों ! तुमलोग हृदयवान बनो, प्रेमी बनो। क्या तुमलोग अपने प्राणों में यह अनुभव कर रहे हो कि देवताओं और ऋषियों की करोड़ों सन्तानें पशु समान हो गयी हैं ? क्या तुमलोग हृदय से यह अनुभव कर रहे हो – कोटि कोटि लोग अनाहार से मर रहे हैं, कोटि कोटि लोग शताब्दियों से आधा पेट खाकर जीवन बिता रहे हैं ? क्या तुमलोग यह सब सोचकर बेचैन हुए हो ? उस चिन्ता ने क्या तुमलोगों को पागल बना दिया है ? क्या देश की दुर्दशा की चिन्ता तुम्हारे ध्यान का एकमात्र विषय हुई है एवं उस चिन्ता में डूब कर क्या तुमलोग नाम यश, स्त्री-पुत्र, विषय सम्पत्ति, यहाँ तक कि शरीर को भी भूल गये हो ? क्या
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स्वामी विवेकानंद जी का अमृत संदेश
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